faiz ahmead faiz

लखनऊ और फैज़: अतुल तिवारी

प्रगतिशील लेखन के आंदोलन से जुडे हुए प्रसिद्ध पटकथा लेखक अतुल तिवारी ने यह लेख लाहौर में आयोजित फैज़ शताबदी समारोह में प्रस्तुत किया था और फिर दिल्ली में थिंक इंडिया मैगज़ीन के फैज़ नम्बर की रिलीज के समय होने वाले कार्यक्रम में भी उन्होंने यह लेख प्रस्तुत किया।  Here is an excerpt.

फैज़ अहमद फैज़ के शेर

हमने सब शेर में संवारे थे
हमसे जितने सुखन तुम्हारे थे (सुखनः बातचीत)

मरने के बाद भी मेरी आंखें खुली रहीं,
आदत जो पड़ गई थी तेरे इंतजार की

Mouzu-e-Sukhan by Faiz Ahmead Faiz

मौज़ू-ए-सुखन

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-माहताब से रात
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हाथ

Subscribe to faiz ahmead faiz