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ऊन्हें डर है - ओम प्रकाश वाल्मीकि

ऊन्हें डर है
बंजड़ धरती का सीना चीर कर
अन्न उगा देने वाले सांवले खुरदरे हाथ
उतनी ही दक्षता से जुट जायेंगे
वर्जित क्षेत्र में भी
जहाँ अभी तक लगा था उनके लिए
नो एंटरी का बोर्ड

फैज़ अहमद फैज़ के शेर

हमने सब शेर में संवारे थे
हमसे जितने सुखन तुम्हारे थे (सुखनः बातचीत)

मरने के बाद भी मेरी आंखें खुली रहीं,
आदत जो पड़ गई थी तेरे इंतजार की

Mouzu-e-Sukhan by Faiz Ahmead Faiz

मौज़ू-ए-सुखन

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-माहताब से रात
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हाथ

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